अमेरिका द्वारा रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट खत्म होने के बाद भारत के लिए सस्ता कच्चा तेल हासिल करना मुश्किल होता नजर आ रहा है। मार्च 2026 में दी गई 30 दिन की राहत अब समाप्त हो चुकी है, जिससे भारतीय तेल कंपनियों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।
भारत लंबे समय से रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करता रहा है। लेकिन अब वैश्विक परिस्थितियों और अमेरिकी सख्ती के चलते यह विकल्प सीमित होता जा रहा है।
अमेरिका का साफ संदेश: नहीं बढ़ेगी छूट
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि रूस और ईरान के तेल पर लगी पाबंदियों में कोई और ढील नहीं दी जाएगी। Scott Bessent ने कहा कि यह छूट केवल अस्थायी थी और इसे आगे बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है।
यह फैसला Donald Trump प्रशासन की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखना प्राथमिकता है।

मिडिल ईस्ट तनाव से बढ़ा तेल संकट
Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान टकराव ने वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित किया है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो आयात पर निर्भर हैं। भारत अपनी लगभग 85 प्रतिशत तेल जरूरतें आयात से पूरी करता है, ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी सीधे अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है।
भारत के विकल्प और रणनीति
रूसी तेल की उपलब्धता कम होने के बाद भारत अब अन्य देशों की ओर रुख कर सकता है। इसमें अमेरिका, वेनेजुएला और मिडिल ईस्ट के अन्य देश शामिल हैं।
हालांकि, इन स्रोतों से मिलने वाला तेल महंगा हो सकता है, जिससे आयात लागत बढ़ेगी। इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है और आम जनता को भी महंगे ईंधन का सामना करना पड़ सकता है।
महंगाई और आम आदमी पर असर
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल पर पड़ता है। इसके साथ ही परिवहन, खाद्य पदार्थ और अन्य जरूरी चीजों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो महंगाई दर में तेज उछाल आ सकता है। इससे आर्थिक विकास की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है।
