दुनिया इस समय भू-राजनीतिक तनाव के दौर से गुजर रही है। होर्मुज़ स्ट्रेट में बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया की स्थिति ने वैश्विक सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसी बीच भारत और रूस ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई पर पहुंचाते हुए एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है।
3000 जवान, 10 जेट और 5 वॉरशिप की तैनाती
नए समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे की जमीन पर सीमित संख्या में सैन्य तैनाती कर सकेंगे। इसमें अधिकतम 3000 सैनिक, 10 सैन्य विमान और 5 युद्धपोत शामिल हैं।
यह व्यवस्था दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को मजबूत करने और जरूरत के समय तेजी से प्रतिक्रिया देने के उद्देश्य से बनाई गई है।
RELOS समझौता क्या है
यह तैनाती RELOS समझौता यानी ‘इंडो-रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट’ के तहत संभव हुई है।
इस समझौते पर फरवरी 2025 में हस्ताक्षर किए गए थे और 2026 में यह प्रभावी हुआ।
इसका उद्देश्य दोनों देशों को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों और संसाधनों का उपयोग करने की सुविधा देना है।
दोनों देशों को मिलेंगी ये सुविधाएं
इस समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के एयरबेस और बंदरगाहों का उपयोग कर सकेंगे।
- युद्धपोतों को पोर्ट सेवाएं और मरम्मत सुविधा
- सैन्य विमानों को एयर ट्रैफिक कंट्रोल और नेविगेशन सपोर्ट
- ईंधन, तकनीकी सहायता और लॉजिस्टिक सपोर्ट
इससे संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण और मानवीय सहायता अभियानों को भी बढ़ावा मिलेगा।
सामरिक साझेदारी को नई मजबूती
भारत और रूस की दोस्ती दशकों पुरानी रही है, लेकिन यह समझौता इसे और मजबूत बनाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को आर्कटिक क्षेत्र जैसे रणनीतिक इलाकों तक पहुंच मिलेगी, जबकि रूस को भारत के सैन्य ढांचे का लाभ मिलेगा।
अमेरिका और चीन क्यों चिंतित
इस समझौते को वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका और चीन जैसे देशों की नजरें इस पर टिकी हैं, क्योंकि इससे क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति पर असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
होर्मुज संकट के बीच भारत और रूस का यह कदम सिर्फ रक्षा सहयोग नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों का संकेत भी है। आने वाले समय में यह साझेदारी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ा रोल निभा सकती है।
