बिहार की राजनीति में 15 अप्रैल 2026 का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब सम्राट चौधरी ने राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि तीन दशकों की राजनीतिक यात्रा का परिणाम है। उनकी कहानी संघर्ष, रणनीति और बदलते राजनीतिक समीकरणों का जीवंत उदाहरण है।
‘लालू की पाठशाला’ से शुरुआत

सम्राट चौधरी का राजनीतिक जीवन 1990 के दशक में शुरू हुआ, जब लालू प्रसाद यादव का बिहार की राजनीति पर दबदबा था। उनके पिता शकुनि चौधरी सात बार विधायक रहे, जिससे सम्राट को राजनीति विरासत में मिली।
1999 में वे सबसे कम उम्र के मंत्री बने, हालांकि उम्र विवाद के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। लालू यादव के साथ का समय उनके लिए राजनीतिक प्रशिक्षण का दौर साबित हुआ, जहां उन्होंने जातीय समीकरण और जमीनी राजनीति की गहरी समझ विकसित की।
नीतीश कुमार के साथ नया अध्याय

राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने सम्राट चौधरी को नीतीश कुमार के करीब ला दिया। 2014 में उन्होंने आरजेडी छोड़ दी और जदयू के साथ जुड़ गए।
नीतीश सरकार में उन्होंने नगर विकास और आवास मंत्री के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन यह साथ भी ज्यादा लंबा नहीं चला और जल्द ही उन्होंने नई राह तलाशनी शुरू कर दी।
भाजपा में उभार और नेतृत्व
जदयू से दूरी के बाद सम्राट चौधरी ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। भाजपा में उन्होंने तेजी से अपनी पहचान बनाई और संगठन के मजबूत नेता बनकर उभरे।
उनकी आक्रामक शैली और संगठनात्मक पकड़ ने उन्हें पार्टी के शीर्ष नेताओं में शामिल कर दिया। यही कारण रहा कि 2026 में उन्हें मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई।
राजनीतिक यात्रा का शिखर
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का संकेत भी है। उन्होंने हर दौर में खुद को ढाला और मौके के अनुसार रणनीति बनाई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उनका नेतृत्व आने वाले समय में राज्य की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
